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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
गच्छ दुर्जय़ राधेय़ं पुरा ग्रसति पाण्डवः |  ३५   क
जहि तूवरकं क्षिप्रं कर्णस्य वलमादधत् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति