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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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व्राह्मण उवाच
तेभ्यः प्रय़च्छ दानानि ये प्रवृत्ता नराधिप |  ४०   क
अहं न प्रतिगृह्णामि किमिष्टं किं ददानि ते |  ४०   ख
व्रूहि त्वं नृपतिश्रेष्ठ तपसा साधय़ामि किम् ||  ४०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति