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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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सञ्जय़ उवाच
स्वलङ्कृतं क्षितौ क्षुण्णं चेष्टमानं यथोरगम् |  ३९   क
रुदन्नार्तस्तव सुतं कर्णश्चक्रे प्रदक्षिणम् ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति