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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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धृतराष्ट्र उवाच
कथं च युद्धं भूय़ोऽभूत्तय़ोः प्राणदुरोदरे |  ४   क
अत्र मन्ये समाय़त्तो जय़ो वाजय़ एव वा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति