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द्रोण पर्व
अध्याय १०८
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धृतराष्ट्र उवाच
विनष्टान्कौरवान्मन्ये मम पुत्रस्य दुर्नय़ैः |  ७   क
न हि कर्णो महेष्वासान्पार्थाञ्ज्येष्यति सञ्जय़ ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति