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अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
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भीष्म उवाच
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः |  ५७   क
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वाय़ुरधोक्षजः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति