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शान्ति पर्व
अध्याय २०४
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गुरुरु उवाच
सरजस्तामसैर्भावैश्च्युतो हेतुवलान्वितः |  १३   क
क्षेत्रज्ञमेवानुय़ाति पांसुर्वातेरितो यथा |  १३   ख
न च तैः स्पृश्यते भावो न ते तेन महात्मना ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति