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शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
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श्रीभगवानु उवाच
व्रह्मणा त्वेवमुक्तस्तु रुद्रः क्रोधाग्निमुत्सृजन् |  ६१   क
प्रसादय़ामास ततो देवं नाराय़णं प्रभुम् |  ६१   ख
शरणं च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं हरिम् ||  ६१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति