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अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
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अङ्गिरा उवाच
मार्गशीर्षं तु यो मासमेकभक्तेन सङ्क्षिपेत् |  १७   क
भोजय़ेच्च द्विजान्भक्त्या स मुच्येद्व्याधिकिल्विषैः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति