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वन पर्व
अध्याय १६३
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अर्जुन उवाच
द्वितीय़श्चापि मे मासो जलं भक्षय़तो गतः |  १५   क
निराहारस्तृतीय़ेऽथ मासे पाण्डवनन्दन ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति