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अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
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अङ्गिरा उवाच
अष्टमेन तु भक्तेन जीवन्संवत्सरं नृप |  ४४   क
गवामय़स्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति