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अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
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युधिष्ठिर उवाच
अधर्मान्मुच्यते केन धर्ममाप्नोति वै कथम् |  ५   क
स्वर्गं पुण्यं च लभते कथं भरतसत्तम ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति