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शान्ति पर्व
अध्याय २२०
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भीष्म उवाच
सुहृदं सर्वभूतानां निर्वैरं शान्तमानसम् |  १०८   क
दृष्ट्वा त्वां मम सञ्जाता त्वय़्यनुक्रोशिनी मतिः ||  १०८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति