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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
अभिवाद्य ततो यक्षं द्वारपालमरन्तुकम् |  १७१   क
कोटिरूपमुपस्पृश्य लभेद्वहु सुवर्णकम् ||  १७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति