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अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
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अङ्गिरा उवाच
दिव्यं वर्षसहस्रं हि विश्वामित्रेण धीमता |  ६५   क
क्षान्तमेकेन भक्तेन तेन विप्रत्वमागतः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति