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अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
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अङ्गिरा उवाच
विमुच्यते चापि स सर्वसङ्करै; र्न चास्य दोषैरभिभूय़ते मनः |  ६९   क
विय़ोनिजानां च विजानते रुतं; ध्रुवां च कीर्तिं लभते नरोत्तमः ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति