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वन पर्व
अध्याय ११९
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वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यस्य वीर्येण वलेन कश्चि; त्समः पृथिव्यां भविता नरेषु |  १६   क
शीतोष्णवातातपकर्शिताङ्गो; न शेषमाजावसुहृत्सु कुर्यात् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति