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उद्योग पर्व
अध्याय १०९
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सुपर्ण उवाच
अत्र यज्ञं समारुह्य ध्रुवं स्थाता पितामहः |  १३   क
ज्योतींषि चन्द्रसूर्यौ च परिवर्तन्ति नित्यशः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति