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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
मैत्रेय़ेणाभिशप्तश्च पूर्वमेव महर्षिणा |  १५   क
ऊरू भेत्स्यति ते भीमो गदय़ेति परन्तप |  १५   ख
अतो दोषं न पश्यामि मा क्रुधस्त्वं प्रलम्वहन् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति