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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
भरतस्य महत्कर्म सर्वराजसु पार्थिवाः |  ४३   क
खं मर्त्या इव वाहुभ्यां नानुगन्तुमशक्नुवन् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति