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अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
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भीष्म उवाच
साधून्गृहस्थान्दृष्ट्वा च तथासाधून्वनेचरान् |  ३२   क
मुक्तांश्चावसथे सक्तांस्तेनासि हरिणः कृशः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति