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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
अस्त्रं हि रामात्कर्णेन भार्गवादृषिसत्तमात् |  १०१   क
यदुपात्तं पुरा घोरं तस्य रूपमुदीर्यते ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति