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द्रोण पर्व
अध्याय १०९
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सञ्जय़ उवाच
स निर्भिन्नो रणे भीमो नाराचैर्मर्मभेदिभिः |  ३१   क
सुस्राव रुधिरं भूरि पर्वतः सलिलं यथा ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति