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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
आचार्य शारद्वतय़ोः सुशुक्ले; कर्णस्य पीतं रुचिरं च वस्त्रम् |  १३   क
द्रौणेश्च राज्ञश्च तथैव नीले; वस्त्रे समादत्स्व नरप्रवीर ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति