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शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
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श्रीभगवानु उवाच
रुद्रो नाराय़णश्चैव सत्त्वमेकं द्विधाकृतम् |  २४   क
लोके चरति कौन्तेय़ व्यक्तिस्थं सर्वकर्मसु ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति