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सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य पापकृतो द्रौणेर्न चेदद्य त्वय़ा मृधे |  १४   क
ह्रिय़ते सानुवन्धस्य युधि विक्रम्य जीवितम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति