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सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यं धर्मेण धर्मज्ञे प्राप्तास्ते निधनं शुभे |  १८   क
पुत्रास्ते भ्रातरश्चैव तान्न शोचितुमर्हसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति