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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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मुनिरु उवाच
त्वं पुनः प्राज्ञरूपः सन्कृपणं परितप्यसे |  ३६   क
अकाम्यान्कामय़ानोऽर्थान्पराचीनानुपद्रुतान् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति