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सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
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द्रौपद्यु उवाच
द्रोणपुत्रस्य सहजो मणिः शिरसि मे श्रुतः |  २०   क
निहत्य सङ्ख्ये तं पापं पश्येय़ं मणिमाहृतम् |  २०   ख
राजञ्शिरसि तं कृत्वा जीवेय़मिति मे मतिः ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति