सौप्तिक पर्व  अध्याय ११

वैशम्पाय़न उवाच

यथैतान्यकृथाः पार्थ महाकर्माणि वै पुरा |  २५   क
तथा द्रौणिममित्रघ्न विनिहत्य सुखी भव ||  २५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति