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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
चरितं महात्मनो दिव्यं साङ्ग्रामिकमिदं शुभम् |  १०४   क
पठन्वै शतरुद्रीय़ं शृण्वंश्च सततोत्थितः ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति