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शान्ति पर्व
अध्याय १६५
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भीष्म उवाच
इत्युक्तवचने तस्मिन्राक्षसेन्द्रे महात्मनि |  २०   क
यथेष्टं तानि रत्नानि जगृहुर्व्राह्मणर्षभाः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति