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वन पर्व
अध्याय २९४
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कर्ण उवाच
वर्मणा कुण्डलाभ्यां च शक्तिं मे देहि वासव |  २१   क
अमोघां शत्रुसङ्घानां घातनीं पृतनामुखे ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति