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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
सत्त्वेषु लिङ्गमावेश्य नलिङ्गमपि तत्स्वय़म् |  ४९   क
मन्यन्ते ध्रुवमेवैनं ये नरास्तत्त्वदर्शिनः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति