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शान्ति पर्व
अध्याय ११
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अर्जुन उवाच
धर्मोऽय़मिति मन्वाना व्रह्मचर्ये व्यवस्थिताः |  ३   क
त्यक्त्वा गृहान्पितॄंश्चैव तानिन्द्रोऽन्वकृपाय़त ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति