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शान्ति पर्व
अध्याय ११
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अर्जुन उवाच
पुण्यं च वत कर्मैषां प्रशस्तं चैव जीवितम् |  ५   क
संसिद्धास्ते गतिं मुख्यां प्राप्ता धर्मपराय़णाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति