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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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भीष्म उवाच
दिष्ट्या देवि प्रसन्ना त्वं दर्शनं चागता मम |  १०   क
यदि वापि प्रसन्नासि जप्ये मे रमतां मनः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति