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अनुशासन पर्व
अध्याय ११
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भीष्म उवाच
कानीह भूतान्युपसेवसे त्वं; सन्तिष्ठती कानि न सेवसे त्वम् |  ४   क
तानि त्रिलोकेश्वरभूतकान्ते; तत्त्वेन मे व्रूहि महर्षिकन्ये ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति