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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
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वासुदेव उवाच
नैव ते निष्ठितं कर्म नैव ते शत्रवो जिताः |  ५   क
कथं शत्रुं शरीरस्थमात्मानं नाववुध्यसे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति