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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
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वासुदेव उवाच
वृत्रेण पृथिवी व्याप्ता पुरा किल नराधिप |  ७   क
दृष्ट्वा स पृथिवीं व्याप्तां गन्धस्य विषय़े हृते |  ७   ख
धराहरणदुर्गन्धो विषय़ः समपद्यत ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति