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शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
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अतिथिरु उवाच
शेषान्नभोक्ता वचनानुकूलो; हितार्जवोत्कृष्टकृताकृतज्ञः |  ११   क
अवैरकृद्भूतहिते निय़ुक्तो; गङ्गाह्रदाम्भोऽभिजनोपपन्नः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति