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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
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धृतराष्ट्र उवाच
दुर्वलाश्चापि सततं नावष्टभ्या वलीय़सा |  १६   क
तिष्ठेथा राजशार्दूल वैतसीं वृत्तिमास्थितः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति