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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
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धृतराष्ट्र उवाच
यदा स्वपक्षो वलवान्परपक्षस्तथावलः |  ७   क
विगृह्य शत्रून्कौन्तेय़ याय़ात्क्षितिपतिस्तदा |  ७   ख
यदा स्वपक्षोऽवलवांस्तदा सन्धिं समाश्रय़ेत् ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति