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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
इमाञ्शकुनिकान्राजन्हन्ति वैतंसिको यथा |  ३३   क
एतद्रूपमधर्मस्य भूतेषु च विहिंसताम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति