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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
एक एव च वीभत्सुः प्रविष्टस्तात भारतीम् |  ८२   क
अविषह्यां महावाहुः सुरैरपि महामृधे ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति