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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
धातुभिश्च सरिद्भिश्च किंनरैर्मृगपक्षिभिः |  ८६   क
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च काननैश्च मनोरमैः ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति