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सभा पर्व
अध्याय ११
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नारद उवाच
समाप्य च हरिश्चन्द्रो महाय़ज्ञं प्रतापवान् |  ६१   क
अभिषिक्तः स शुशुभे साम्राज्येन नराधिप ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति