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वन पर्व
अध्याय ११
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मैत्रेय़ उवाच
तीर्थय़ात्रामनुक्रामन्प्राप्तोऽस्मि कुरुजाङ्गलम् |  ११   क
यदृच्छय़ा धर्मराजं दृष्टवान्काम्यके वने ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति