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कर्ण पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सारथिर्ज्ञात्वा द्रोणपुत्रमचेतनम् |  ४०   क
अपोवाह रणाद्राजन्सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति