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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
स धर्मराजो मणिहेमदण्डां; जग्राह शक्तिं कनकप्रकाशाम् |  ३८   क
नेत्रे च दीप्ते सहसा विवृत्य; मद्राधिपं क्रुद्धमना निरैक्षत् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति