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वन पर्व
अध्याय ११
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वैशम्पाय़न उवाच
इतः प्रच्यवतां रात्रौ यः स तेषां महात्मनाम् |  २३   क
आवृत्य मार्गं रौद्रात्मा तस्थौ गिरिरिवाचलः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति